بدھ، 7 اگست، 2024

तौबा की नमाज़

 तौबा की नमाज़
तहरीर: शैख़ मक़बूल अहमद सलफ़ी हाफ़िज़ाहुल्लाह
हिंदी मुतर्जिम: हसन फ़ुज़ैल 

आदमी गुनाहों का पुतला है, ख़ताएँ होती रहती हैं। बनी आदम को हमेशा अल्लाह की तरफ़ रुजू करते रहना चाहिए। जब बनी आदम से ग़लती होती है और वह शर्मिंदा होकर अल्लाह से माफ़ी मांगता है तो वह अल्लाह को बहुत ज़्यादा माफ़ करने वाला पाता है।
अल्लाह ने अपने बंदों को माफ़ी पर उभारा है, फ़रमान-ए-इलाही है:
وتوبوا إلى الله جميعا أيها المؤمنون لعلكم تفلحون​
तर्जुमा: और ईमान लाने वालो, तुम सब अल्लाह की तरफ़ तौबा (रुजू) करो ताकि तुम कामयाब हो।  
(सूरह नूर: 31)
और नबी ﷺ ने जहाँ तौबा पर उभारा वहीं आपका इस पर कसरत से अमल भी रहा है। आप दिन में 100-100 बार इस्तिग़फार किया करते थे।  
तौबा के लिए नमाज़-ए-तौबा शर्त नहीं, मुस्तहब है। 
तौबा के लिए नदामत/शर्मिंदगी ही काफ़ी है, ताहम इस्तिग़फ़ार का मुस्तहसन (अच्छा) तरीक़ा यह है कि बंदा किसी ख़ास या आम गुनाह सरज़द हो जाने पर तौबा करने की नियत से वुज़ू कर के 2 रकात नमाज़ अदा करने के बाद निहायत ख़ुलूस-ए-दिल से अपने गुनाहों पर शर्मिंदा हो और अल्लाह से माफ़ी मांगे और आइंदा उन गुनाहों को छोड़ दे और ना करने का अज़्म कर ले तो अल्लाह रब्बुल आलमीन अपने बंदे को माफ़ फ़रमा देते हैं।
तौबा की नमाज़ की दलील:
नबी ﷺ ने फ़रमाया:
ما من عبد يذنب فيحسن الطهور ثم يقوم فيصلي ركعتين ثم يستغفر الله إلا غفر الله له​
तर्जुमा: कोई आदमी जब गुनाह करता है फिर वुज़ू कर के 2 रकात नमाज़ पढ़ता है और अल्लाह से इस्तिग़फार करता है तो अल्लाह उसे माफ़ फ़रमा देता है।  
(अबू दाऊद: 1521)
इस हदीस को अल्बानी रहिमहुल्लाह ने सहीह क़रार दिया है।

क्या बिना क़दम छुपाए औरतों की नमाज़ नहीं होगी?

क्या बिना क़दम छुपाए औरतों की नमाज़ नहीं होगी?

जवाब: इब्न अबी शैबा की रिवायत है जिसे शैख़ अल्बानी रहिमहुल्लाह ने सहीह क़रार दिया है:
قال ابنُ عمرَ إذا صلت المرأةُ فلتصلِّ في ثيابِها كلِّها : الدرعِ والخمارِ والملحفةِ(تمام المنة:162)
तर्जुमा: इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया: जब औरत नमाज़ पढ़े तो मुकम्मल लिबास में नमाज़ पढ़े यानी क़मीज़, दुपट्टा और क़मीज़ के ऊपर चादर।
औरत का यह लिबास सलफ़ के यहाँ मा'रूफ़ है, इसलिए बहालते नमाज़ जहाँ औरत को बालों समेत मुकम्मल जिस्म छुपाना है (सिवाय चेहरे के, लेकिन अजनबी हों तो चेहरा भी वाजिब अल-सतर है), वहीं दबीज़ (मोटे) कपड़े से अच्छी तरह दोनों क़दमों को भी ढकना है। कुछ अहल-ए-इल्म नमाज़ में दोनों क़दमों का ढांकना वाजिब क़रार देते हैं। मालिक बिन अनस कहते हैं कि अगर औरत ने नमाज़ पढ़ी इस हाल में कि उसके बाल खुले थे या उसके क़दमों का ज़ाहिरी हिस्सा खुला था तो अपनी नमाज़ दोहराएगी अगर वह नमाज़ के वक़्त में ही हो।
कुछ अहल-ए-इल्म अदम वुजूब के क़ाइल हैं, बहर-कैफ़! एहतियात का तक़ाज़ा है कि औरत नमाज़ में अपने दोनों पैरों को ढक कर नमाज़ पढ़े।
~ शैख़ मक़बूल अहमद सलफ़ी हिफ़्ज़हुल्लाह

क्या नौ-मौलूद (नवजात) की तहनीक करना यानी गुट्ठी पिलाना मसनून है?

क्या नौ-मौलूद (नवजात) की तहनीक करना यानी गुट्ठी पिलाना मसनून है?

जवाब: कुछ अहल-ए-इल्म ने कहा है कि नौ-मौलूद की तहनीक (किसी चीज़ का चबाकर बच्चे के मुँह में देना) करना रसूलुल्लाह ﷺ के साथ ख़ास है क्योंकि यह तबर्रुक है, जबकि अक्सर अहल-ए-इल्म ने नौ-मौलूद के लिए तहनीक करना मुस्तहब लिखा है। बल्कि इमाम नववी रहिमहुल्लाह ने शरह मुस्लिम में तहनीक के इस्तिहबाब पर उलमा का इत्तिफ़ाक़ ज़िक्र किया है। लिहाज़ा हमें बच्चों की विलादत पर खजूर या किसी मीठी चीज़ से तहनीक करना चाहिए।
عَنْ أَبِي مُوسَى رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، قَالَ: «وُلِدَ لِي غُلاَمٌ، فَأَتَيْتُ بِهِ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَسَمَّاهُ إِبْرَاهِيمَ، فَحَنَّكَهُ بِتَمْرَةٍ، وَدَعَا لَهُ بِالْبَرَكَةِ، وَدَفَعَهُ إِلَيَّ»، وَكَانَ أَكْبَرَ وَلَدِ أَبِي مُوسَى(صحيح البخاري:5510)
सय्यदना अबू मूसा अशअरी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, उन्होंने कहा कि मेरे यहाँ लड़का पैदा हुआ तो मैं उसे लेकर नबी ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर हुआ। आपने उसका नाम इब्राहीम रखा और खजूर को चबा कर उसकी गुट्ठी दी, और उसके लिए ख़ैर व बरकत की दुआ फ़रमाई फिर वह मुझे दे दिया। यह सय्यदना अबू मूसा रज़ियल्लाहु अन्हु के सबसे बड़े लड़के थे।
इस हदीस से मालूम हुआ कि सहाबा-ए-किराम अपने बच्चों को नबी ﷺ के पास ख़ैर व बरकत की दुआ के लिए लाते, आप बच्चे का नाम भी रखते और तहनीक भी करते। तो जिस तरह नौ-मौलूद (नवजात) का नाम रखना आम है, उसी तरह तहनीक भी आम है, इसे रसूलुल्लाह ﷺ के साथ ख़ास नहीं माना जाएगा।
~ शैख़ मक़बूल अहमद सलफ़ी हिफ़्ज़हुल्लाह

ज़ालिम फ़िरौन पर अल्लाह का अज़ाब और इबरत और नसीहत

ज़ालिम फ़िरौन पर अल्लाह का अज़ाब और इबरत और नसीहत

तहरीर: शैख़ मक़बूल अहमद सलफ़ी हाफ़िज़ाहुल्लाह
हिंदी मुतर्जिम: हसन फ़ुज़ैल

ज़ुल्म अंधेरा है, ज़मीन में फ़साद-फ़ी-अल-अर्ज़ (अशांति) है, और कुरह-अर्ज़ (ज़मीन) पर दुनिया का सबसे बड़ा गुनाह है। अल्लाह शिर्क के अलावा अपने नफ़्सो पर और अल्लाह के हक़ में हुए जुल्म और ज़्यादती को चाहे तो माफ़ कर सकता है, मगर बंदों के हक़ में ज़ुल्म और ज़्यादती करने वालों को हरगिज़ माफ़ नहीं करेगा। भले दुनिया की अदालतों में ऐसे ज़ालिमों के लिए कोई सज़ा न हो, मगर ख़ालिक-ए-काइनात की अदालत से दुनिया की सज़ा मुक़र्रर होती है और ज़रूर उसे मिलकर रहती है।
आख़िरत में तो अलग से सज़ा मुक़र्रर है ही। इंसानी तारीख़ ज़ालिमों की इब्रतनाक सज़ाओं से भरी पड़ी है। मैं यहाँ क़ुरआन-ए-मुक़द्दस के हवाले से दुनिया के ज़ालिम तरीन इंसान फ़िरौन के ज़ुल्म और इस्तिब्दाद (अत्याचार) और उस पर अल्लाह के क़हर और अज़ाब का ज़िक्र करना चाहता हूँ, जिसमें दुनिया वालों के लिए इबरत और नसीहत है मगर कम ही लोग नसीहत हासिल करते हैं। अल्लाह का फ़रमान है:
فاليوم ننجيك ببدنك لتكون لمن خلفك آية وان كثيرا من الناس عن آياتنا لغافلون.(يونس:92)
तर्जुमा: पस आज सिर्फ़ तेरी लाश को निजात देंगे ताकि तू उनके लिए निशाने इबरत हो जो तेरे बाद हैं और हक़ीक़त यह है कि बहुत से आदमी हमारी निशानियों से ग़ाफ़िल हैं।
बनी इस्राइल, जिस की तरफ़ मूसा (अलैहिस्सलाम) भेजे गए, दरअसल याक़ूब (अलैहिस्सलाम) की 12 औलाद से चलने वाली 12 क़बीलों की नस्ले हैं जो मिस्र में थीं। अल्लाह ने बनी इस्राइल को बहुत सारी नेमतों से नवाज़ा था, उनको पूरी दुनिया पर बर्तरी और हुकूमत अता फ़रमाई थी। अल्लाह का फ़रमान है:
يا بني اسرآئيل اذكروا نعمتي التي أنعمت عليكم واني فضلتكم على العالمين.(البقرة:47)
तर्जुमा: ऐ औलाद-ए-याक़ूब, मेरी उस नेमत को याद करो जो मैंने तुम पर इनाम की और मैंने तुम्हें तमाम जहानों पर फ़ज़ीलत दी।
मिस्र में क़िब्तियों की भी क़ौम थी, जिससे फ़िरौन यानी बादशाह हुआ करता था। जब बनी इस्राइल ने अल्लाह के अहकाम की नाफ़रमानी की हद से तजावुज़ किया तो अल्लाह ने उन पर 4 सदियों तक ज़ालिम फ़िरौन को मुसल्लत कर दिया। फ़िरौन ने बनी इस्राइल को अपना ग़ुलाम बना रखा था और उनमें से कोई यहाँ से भाग कर भी नहीं जा सकता था। दोबारा अल्लाह ने बनी इस्राइल पर मेहरबानी की और मूसा (अलैहिस्सलाम) को उनकी तरफ़ नबी बनाकर भेजा और आपकी बदौलत फ़िरौन के ज़ुल्म से निजात दी।
मूसा (अलैहिस्सलाम) और फ़िरौन का क़िस्सा बड़ा लंबा है। सुरह क़सस, सुरह शुअरा और दीगर मुत'अद्दिद मक़ामात पर इसकी तफ़सील मज़कूर है। मैं क़ुरआन और तफ़सीरो के हवाले से मुख़्तसर तौर पर यहाँ मूसा (अलैहिस्सलाम) का क़िस्सा और बनी इस्राइल का फ़िरौन के ज़ुल्म से निजात बयान कर देता हूँ। मूसा (अलैहिस्सलाम) की पैदाइश से पहले नजूमियों और काहिनों ने फ़िरौन को ख़बर दी के बनी इस्राइल में एक लड़का पैदा होने वाला है जो उसकी हुकूमत और सल्तनत का ख़ात्मा करने वाला है। इस वजह से फ़िरौन ने बनी इस्राइल के हर लड़के को क़त्ल करवाना शुरू कर दिया।क़त्ल की वजह जब ख़िदमत गुज़ार बनी इस्राइल की कमी होने लगी तो फिर एक साल छोड़ दिया करता था।
मूसा अलैहिस्सलाम के बड़े भाई हारून की पैदाइश क़त्ल वाले साल से पहले और मूसा (अलैहिस्सलाम) की पैदाइश क़त्ल वाले साल हुई। अल्लाह ने मूसा (अलैहिस्सलाम) की माँ की तरफ़ वह्यी की कि इसे ताबूत में रख कर दरिया में बहा दो और कोई ग़म न करो, साथ ही यह वादा भी किया के इस बच्चे को उसके पास दुबारा लौटाएगा और उसे पैग़म्बर भी बनाएगा। माँ ने अल्लाह के हुक्म की तामील की और बेटी को लोगों की नज़रों से दूर हो कर उसे देखते रहने की ताकीद की। क़ुदरत का करिश्मा के इस ताबूत पर फ़िरौन के हवारीयों की नज़र पड़ती है। वह उसे दरबार में ले आते हैं, लड़का देख कर फ़िरौन ने क़त्ल का हुक्म दिया मगर फ़िरौन की बीवी ने यह कह कर बचा लिया कि शायद यह हमारे किसी काम आए या इसे हम अपना बेटा बना लें।
क़ुदरत ने बच्चे को माँ का ही दूध पिलाया क्योंकि उसने किसी का दूध पिया ही नहीं। फ़िरौन ने जिसे अपने हलाक करने वाले की तलाश थी, उसके क़त्ल के दर पे था और इस काम के लिए सैकड़ों लड़कों का क़त्ल करवा चुका था, उस वक्त वह अपने महल में उसी की परवरिश कर रहा था। यह भी क़ुदरत का अज़ीम करिश्मा है। जवानी तक वहाँ पले बढ़े। एक रोज़ उन्होंने एक क़िब्ती को बनी इस्राइल पर ज़ुल्म करते देखा, पहले उसे मना किया, बाज़ न आने पर एक मुक्का रसीद कर दिया और क़िब्ती उसी वक्त मर गया।
इस डर से कि कहीं फ़िरौन क़िब्ती को क़त्ल करने के जुर्म में हमें क़त्ल न करवा दे, वह मदीयन चले गए। वहाँ एक कुएं पर लोगों को जानवर को पानी पिलाते हुए देखा। उनके 2 लड़कियाँ भी थीं जो काफ़ी देर से इंतज़ार कर रही थीं। मूसा (अलैहिस्सलाम) ने वजह पूछी तो उन्होंने जवाब दिया के हम सब से आख़िर में अपने जानवरों को पिलाएंगे। मूसा (अलैहिस्सलाम) ने पानी पिलाने पर उनकी बग़ैर उजरत मदद की। लड़कियाँ घर जा कर अपने वालिद को आपके बारे में बताया और अमानतदारी और क़वी होने की सिफ़त बता कर अपने यहाँ काम पर रखने की सलाह दी। बाप ने मूसा (अलैहिस्सलाम) को तलब किया और 8 साल ख़िदमत करने पर अपनी एक बेटी से निकाह का वादा किया, अगर 10 साल पूरे करे तो यह एहसान होगा।
मूसा (अलैहिस्सलाम) राज़ी हो गए। जब ख़िदमत करते-करते मुद्दत पूरी हो गई तो बूढ़े बाप ने आप से एक बेटी का निकाह कर दिया। अब मूसा (अलैहिस्सलाम) अपने अहल और माल के साथ वापिस लौट रहे थे कि रास्ते में आग की तलाश में एक जगह रुक गए। बीवी को इंतिज़ार करने को कहा और ख़ुद उस जगह आग लेने चले गए जहां से रोशनी नज़र आ रही थी। वहां पहुंचने पर अल्लाह ने मूसा (अलैहिस्सलाम) से कलाम किया और आपको नुबूवत से सरफ़राज़ फ़रमा कर फ़िरौन की तरफ़ जा कर नरमी से तबलीग़ करने का हुक्म दिया। अल्लाह ने आपको बतौर-ए-मौजिज़ा 9 निशानियाँ अता फ़रमाई। मूसा (अलैहिस्सलाम) के अंदर एक ख़ौफ़ तो यह था कि उन्होंने क़िब्ती को मार दिया था और दूसरा ख़ौफ़ यह था कि फ़िरौन बड़ा ज़ालिम था, वह रब होने का दावा करता था। साथ ही आपकी ज़बान में लुक्नत (हकलापन) भी थी, इस लिए अल्लाह से 4 बातों की दुआ की। अल्लाह फ़रमाता है:
قال رب اشرح لي صدري ويسرلي امري واحلل عقدة من لساني يفقهوا قولي واجعل لي وزيرا من اهلي هارون اخي اشدد به ازري واشركه في امري.(طه: 25-32)
तर्जुमा: मूसा ने कहा, ऐ मेरे परवर्दिगार (1) मेरा सीना मेरे लिए खोल दे। (2) और मेरे काम को मुझ पर आसान कर दे। (3) और मेरी ज़बान की गिरह भी खोल दे ताकि लोग मेरी बात अच्छी तरह समझ सके। (4) और मेरा वज़ीर मेरे कुन्बे में से कर दे यानी मेरे भाई हारून को। तो उससे मेरी कमर कस दे और उसे मेरा शरीक-ए-कार (मददगार) कर दे।
दोनों भाई मूसा और हारून ने फ़िरौन को रब्बुल आलमीन का पैग़ाम सुनाया और अल्लाह वहदहु ला शरीक की इबादत की तरफ़ बुलाया मगर उसने सरकशी की और नुबुव्वत की निशानियाँ तलब की। मूसा अलैहिस्सलाम ने अपने नबी होने का मौजिज़ा पेश किया। लाठी का सांप बन जाना, बग़ल में हाथ लगाने से उसमें चमक पैदा होना। फ़िरौन ने जादूगरी कहकर इसका भी इनकार किया।
फिर फ़िरौन ने अपने माहिर जादूगरों से मूसा अलैहिस्सलाम का मुक़ाबला करवाया। मुक़ाबले में पहले फ़िरौन के जादूगरों ने अपनी लाठियाँ और रस्सियाँ ज़मीन पर फेंकी और आख़िर में मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी लाठी फेंकी जो अजदहा बनकर जादूगरों के तमाम आलात निगल गई। यह मंज़र देखकर सारे जादूगर मूसा और हारून के रब पर ईमान ले आए। फ़िरौन अब भी ईमान न लाया और ख़ुद को ही माबूद कहलाता रहा। लोगों से कहता, "أنا ربكم الأعلى" यानी मैं तुम सबका सबसे बड़ा माबूद हूँ। यह फ़िरौन का सबसे बड़ा गुनाह था। इसके अलावा क़ुरआन ने फ़िरौन को सरकशी करने वाला, बनी इस्राइल पर ज़ुल्म और सितम ढाने वाला, उनका क़त्ल करने वाला और फ़साद मचाने वाला कहा है। अल्लाह फ़रमाता है:
"ان فرعون علا في الأرض وجعل أهلها شيعا يستضعف طائفة منهم يذبح أبناءهم ويستحيي نساءهم انه كان من المفسدين."
(القصص: 4)
तर्जुमा: यक़ीनन फ़िरौन ने ज़मीन में सरकशी कर रखी थी और वहाँ के लोगों को गिरोह गिरोह बना रखा था और उनमें से एक फ़िरक़े को कमज़ोर कर रखा था और उनके लड़कों को तो ज़िब्ह कर डालता था और उनकी लड़कियों को ज़िंदा छोड़ देता था। बेशक वह था ही मुफ़सिदों में से।
इसके अलावा रसूल को झुठलाने वाले फ़िरौन और उसके लश्कर को क़ुरआन ने कहीं ज़ालिम क़ौम कहा, कहीं फ़ासिक़ क़ौम कहा, कहीं क़ाहिर कहा, कहीं सरकशी और बाग़ी और कहीं मुतकब्बिर कहा। एक तरफ़ फ़िरौन अपने इन मज़ालिम (ज़ुल्म-ओ-सितम) की वजह से अल्लाह की अदालत से दर्दनाक अज़ाब का मुस्तहिक़ था ही, दूसरी तरफ मूसा अलैहिस्सलाम ने उसकी हलाकत की अल्लाह से दुआ भी माँगी। अल्लाह फ़रमाता है:
"وقال موسى ربنا آتيت فرعون وملاه زينة واموالا في الحياة الدنيا ربنا ليضلوا عن سبيلك ربنا اطمس على أموالهم واشدد على قلوبهم فلا يؤمنوا حتى يروا العذاب الاليم."
(يونس: 88)
तर्जुमा: और मूसा ने अर्ज़ किया कि ऐ हमारे रब! तू ने फ़िरौन को और उसके सरदारों को शानदार ज़ीनत और तरह-तरह के माल दुनियावी ज़िंदगी में दिए। ऐ हमारे रब! (इसी वास्ते दिए हैं कि) वह तेरी राह से गुमराह करें। ऐ हमारे रब! उनके माल को नीस्त-नाबूद (तबाह) कर दे और उनके दिलों को सख़्त कर दे। फिर यह ईमान न लाने पाएं जब तक कि दर्दनाक अज़ाब को न देख लें।
फिर क्या था, दुनिया में ही फ़िरौन और उसके लश्कर पर अल्लाह की तरफ़ से क़िस्म क़िस्म का अज़ाब आना शुरू हो गया। क़हत साली, फलों की कमी, तूफ़ान, टिड्डियाँ, घुन का कीड़ा, मेंढक, और ख़ून का अज़ाब आया। यहाँ तक कि उनके साख़्ता-पर्दाख़्ता (बनाया- सँवारा) कारख़ाने और ऊँची ऊँची इमारतों को भी दरहम बरहम कर दिया गया। फ़िरौन मूसा अलैहिस्सलाम से अज़ाब हटाने के बदले बनी इस्राइल की आज़ादी का वादा करता मगर कभी निभाता नहीं।
फ़िरौन और उसके लश्कर पर दुनिया का सबसे बड़ा अज़ाब यह आया कि जब मूसा अलैहिस्सलाम बनी इस्राइल को लेकर एक दिन अचानक भाग निकले और फ़िरौन अपने लश्कर के साथ उनका पीछा किया। दरिया के पास पहुँचकर मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के हुक्म से पानी पर लाठी मारी और 12 रास्ते बन गए। इस तरह मूसा अलैहिस्सलाम और उनकी क़ौम उन रास्तों से पार निकलकर हमेशा के लिए फ़िरौनी ज़ुल्म और सितम से निजात पा गए। और जब फ़िरौन और उसका लश्कर दरिया उबूर करने लगे, तो अल्लाह ने पानी को आपस में मिलाकर डुबो दिया और सबको एक आन (वक्त) में मौत की नींद सुला दिया। अल्लाह का फ़रमान है:
"واذا فرقنا بكم البحر فانجيناكم واغرقنا آل فرعون وانتم تنظرون."
(البقرة: 50)
तर्जुमा: और जब हमने तुम्हारे लिए दरिया चीर दिया और तुम्हें उस से पार कर दिया और फ़िरौनीयों को तुम्हारी नज़रों के सामने उसमें डुबो दिया।
तिरमिज़ी (3108) की सही हदीस में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ज़िक्र किया कि जब फ़िरौन डूबने लगा, तो जिब्रईल अलैहिस्सलाम फ़िरौन के मुँह में मिट्टी ठूँसने लगे इस डर से कि वह कहीं "لا اله الا الله" न कह दे, तो अल्लाह को उस पर रहम आ जाए।
फ़िरौन को उसके ज़ुल्म के बदले दुनिया में मुख़्तलिफ़ क़िस्म की सज़ा मिली, दर्दनाक तरीक़े से पानी में डुबो दिया गया। मरते वक्त फ़रिश्ते उसके मुँह में दरिया की मिट्टी ठूँसते रहे। मज़लूम के सामने ज़ालिम फ़िरौन को कैफ़र-ए-किरदार (बुरे कर्मों का बदला/किए की सज़ा) तक पहुँचाया गया, यानी उसको डुबोकर मारा गया। मरकर भी क़यामत तक (आलम ए बरज़ख़ में) फ़िरौन और उसकी आल को अज़ाब मिलता रहेगा और क़यामत में भी सख़्त तरीन अज़ाब दिया जाएगा। अल्लाह का फ़रमान है:
"النار يعرضون عليها غدوا وعشيا ويوم تقوم الساعة ادخلوا آل فرعون أشد العذاب."
(غافر: 46)
तर्जुमा: आग है जिसके सामने यह हर सुबह शाम लाए जाते हैं और जिस दिन क़यामत क़ायम होगी (फ़रमान होगा कि) फ़िरौनीयों को सख़्त तरीन अज़ाब में डाल दो।
इस पूरे वाक़ि'आ से एक अहम नसीहत मिलती है कि अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम और आप पर ईमान लाने वालों को दुनिया के सबसे ज़ालिम हुक्मरान से निजात दी। यहाँ तक कि फ़िरौन की बीवी आसिया भी ईमान ले आती है। फ़िरौन से निजात और जन्नत में घर के लिए अल्लाह से दुआ करती है।
ज़ालिम फिरौन की हलाकत और तबाही के मुताल्लिक़ अल्लाह ने फ़रमाया कि देखो ज़ालिम का क्या अंजाम हुआ:
"فاخذناه وجنوده فنبذناهم في اليم فانظر كيف كان عاقبة الظالمين."
(القصص: 40)
तर्जुमा: बिलआख़िर हमने उसे और उसके लश्कर को पकड़ लिया और दरिया में डुबो दिया। अब देख लो कि उन गुनहगारों का अंजाम कैसा कुछ हुआ?
एक दूसरी जगह अल्लाह ने फ़रमाया:
"ثم بعثنا من بعدهم موسى بآياتنا إلى فرعون وملئه فظلموا بها فانظر كيف كان عاقبة المفسدين."
(الأعراف: 103)
तर्जुमा: फिर उनके बाद हमने मूसा को अपने दलाईल देकर फ़िरौन और उसके उमरा (हाकिम/दौलतमंदो) के पास भेजा, मगर उन लोगों ने उनका बिल्कुल हक़ अदा न किया। पस देखो उन मुफ़सिदों का क्या अंजाम हुआ।
नसीहत से मुताल्लिक एक आख़री बात अर्ज़ करना चाहता हूँ कि अल्लाह ने फ़िरौन की लाश महफ़ूज़ रखने का वादा किया है ताकि बाद वालों के लिए नसीहत रहे। फ़रमान ए इलाही है:
"فاليوم ننجيك ببدنك لتكون لمن خلفك آية وان كثيرا من الناس عن آياتنا لغافلون."
(يونس: 92)
तर्जुमा: पस आज हम तेरी लाश को निजात देंगे ताकि तू उनके लिए निशाने इबरत हो जो तेरे बाद हैं और हक़ीक़त यह है कि बहुत से आदमी हमारी निशानियों से ग़ाफ़िल हैं। इस आयत के तनाज़ुर में मिस्र के म्यूज़ियम में मौजूद ममी की हुई लाश को अक्सर लोग फ़िरौन-ए-मूसा कहते हैं। वाज़ेह रहे कि यह सिर्फ़ एक साइंस की तहक़ीक़ है, इस लिए इस लाश को हतमी तौर पर फ़िरौन की लाश नहीं कह सकते हैं और ना ही हतमी तौर पर यह कह सकते हैं कि लाश की हिफ़ाज़त से मक़सूद क़यामत तक हिफ़ाज़त है क्योंकि आयत में इसकी सराहत नहीं है।

منگل، 26 اپریل، 2022

बैतुल माल का नक़दी अमवाल से ज़रूरत की अश्या ख़रीद कर देना

बैतुल माल का नक़दी अमवाल से ज़रूरत की अश्या ख़रीद कर देना

जवाब: मक़बूल अहमद सलफ़ी
इस्लामिक दअ्वह सेंटर-मिस्रह-ताइफ़

रमज़ानुल मुबारक के मौक़ा से मालदार लोग उमूमन अपने माल की ज़कात निकालते हैं, इनमें से बअ्ज़ तो ख़ुद से ग़ुरबा व मसाकीन और मुस्तहक़ीन में ज़कात तक़्सीम करते हैं जबकि कुछ लोग दीनी मराकिज़ और बैतुल माल नामी इदारों को बतौर ज़कात नक़दी रक़ूम देते हैं। यह इदारे ज़कात की रक़म से ज़रूरतमन्दों को ज़रूरत की अश्या ख़रीद कर देते हैं। एक मुद्दत से यह काम बर्रे सग़ीर में होता चला आ रहा है, सऊदी अरब के ख़ैराती इदारे भी फ़ुक़रा व मसाकीन में राशन पॅकेज, साथ में कुछ नक़दी रक़म दिया करते हैं लेकिन आज कल इसके अद्म जवाज़ पर बअ्ज़ उलमा के फ़तावा सोशल मीडिया पर गश्त कर रहे हैं जिनकी वजह से आम लोगों में काफ़ी बेचैनी है और वह इस मुआमले में मुख़्तलिफ़ उलमा से रुजूअ् कर रहे हैं।
मालेगांव से फ़रीद अहमद साहिब मुझे लिखते हैं "आज कल ज़कात के माल से राशन किट तक़्सीम को लेकर मस्अला बताया जा रहा है कि ज़कात अदा नहीं होगी। यहां सवाल यह है कि अहले ख़ैर हज़रात जमाअत के बैतुल माल में अपनी ज़कात रक़म की शक्ल में अदा करते हैं और बैतुल माल के ज़िम्मेदारान हस्बे ज़रूरत व मौक़ा के मुस्तहिक़ अफ़राद को राशन किट, सर्दी के मौसम में कम्बल, बे-रोज़गार अफ़राद को ठेला गाड़ी या दीगर ज़राए से ज़रिया मआश का नज़्म करते हैं, बअ्ज़ हज़रात ईदैन के मौक़े पर नए कपड़े तक़्सीम करते हैं वग़ैरा। ऐसी सूरत में जमाअत के बैतुल माल के ज़िम्मेदारान को क्या रक़म के ज़रिए से ही इमदाद करना होगी या मुरव्वजा तरीक़े से भी इमदाद की जा सक्ती है जिसका ऊपर ज़िक्र किया गया है। बराहे करम इस सिलसिले में क़ुरआन व हदीस की रौशनी में दलाइल के साथ रहनुमाई फ़रमाएं। नवाज़िश होगी"।
इस सवाल का जवाब लिखने से पहले इससे मुताल्लिक़ मुख़्तलिफ़ उलमा के फ़तावा व आरा का गहराई से मुतालआ किया हूं और इस नतीजे पर पहुंचा कि इस मुआमले में कोई इख़्तिलाफ़ नहीं है कि साहिबे निसाब अपने नक़दी रक़म की ज़कात हर हाल में नक़दी सूरत में ही निकालेगा ख़्वाह वह बज़ाते ख़ुद मुस्तहिक़ को दे या नियाबत के लिए दीनी मराकिज़ और बैतुल माल को दे ताहम दीनी मराकिज़ और बैतुल माल नक़दी ज़कात में तसर्रुफ़ कर सक्ते हैं या लोगों की मस्लिहत व ज़रूरत का ख़याल करके उनके मुनासिब हाल अश्या माली ज़कात से ख़रीद कर दे सकते हैं? इस मुआमले में उलमा के दरमियान इख़्तिलाफ़ नज़र आता है।
इस मुख़्तलफ़ फ़ीही मस्अले का जवाब जानने से पहले यह बताना ज़रूरी है कि जहां मुसलमान रहते हैं वहां मुसलमानों का इस्लामी ख़ज़ाना या बैतुल माल का वजूद होना चाहिए जिस से मुसलमानों में मौजूद ज़रूरतमन्दों की हाजात पूरी की जा सके जैसा कि हम अहेदे रिसालत व ख़िलाफ़त में देखते हैं मगर इस जानिब मुसलमानों में अद्म इत्तिहाद की वजह से बड़ी कोताही नज़र आती है ताहम कुछ लोग जमाअती सतह पर बैतुल माल या दीनी मराकिज़ के ज़रिए समाजी ख़िदमात अंजाम देते हैं जो कि क़ाबिले क़द्र है, मज़ीद इसमें बहतरी की ज़रूरत दरकार है और जो इन्फ़िरादी या इज्तिमाई तौर पर सदक़ात व अतिय्यात जमा करके ख़ियानत करते हैं उनकी इस्लाह भी होनी चाहिए।
अल्लामह सुयूती रहिमहुल्लाह ने तारीख़ अल-ख़ुलफ़ा में लिखा है कि इस्लामी हुकूमत के शुरू दौर में बैतुल माल का क़ियाम इस तरह नहीं था जिस तरह हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हु ने मुतआरिफ़ करवाया। मैं उनके दौर से यानी अहेदे फ़ारूक़ी से बैतुल माल की दो मुस्तनद मिसालें बयान करना चाहता हूं ताकि इन मिसालों से अपनी बात वाज़ेह कर सकूं।
(1) पहला वाक़िया सहीह बुख़ारी का है, ज़ैद बिन अस्लम रिवायत करते हैं, उन से उनके वालिद ने बयान किया कि मैं उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहू अन्हु के साथ बाज़ार गया। उमर रज़ियल्लाहू अन्हु से एक नौजवान औरत ने मुलाक़ात की और अर्ज़ किया कि अमीरुल मुअ्मिनीन! मेरे शौहर की वफ़ात हो गई है और चंद छोटी छोटी बच्चियां छोड़ गए हैं। अल्लाह की क़सम कि अब ना उनके पास बकरी के पाए हैं कि उनको पका लें, ना खेती है, ना दूध के जानवर हैं। मुझे डर है कि वह फ़ुक़्र व फ़ाक़ा से हलाक ना हो जाएं। मैं ख़फ़ाफ़ बिन ईमा ग़िफ़्फ़ारी रज़ियल्लाहू अन्हु की बेटी हूं। मेरे वालिद नबी करीम के साथ गज़वए हुदैबियह में शरीक थे। यह सुन कर उमर रज़ियल्लाहू अन्हु उनके पास थोड़ी देर के लिए खड़े हो गए, आगे नहीं बढ़े। फिर फ़रमाया, मरहबा, तुम्हारा ख़ानदानी ताल्लुक़ तो बहुत क़रीबी है। फिर आप एक बहुत क़वी ऊँट की तरफ़ मुड़े जो घर में बंधा हुवा था और उस पर दो बोरे ग़ल्ले से भरे हुए रख दिए। उन दोनों बोरों के दरमियान रुपया और दूसरी ज़रूरत की चीज़ें और कपड़े रख दिए और उसकी नकील उनके हाथ में थमा कर फ़रमाया कि इसे ले जा, यह ख़त्म ना होगा इससे पहले ही अल्लाह तआला तुझे इससे बेहतर देगा। एक साहिब ने इस पर कहा, ऐ अमीरुल मुअ्मिनीन! आप ने उसे बहुत दे दिया। उमर रज़ियल्लाहू अन्हु ने कहा, तेरी माँ तुझे रोए, अल्लाह की क़सम! इस औरत के वालिद और इसके भाई जैसे अब भी मेरी नज़रों के सामने हैं कि एक मुद्दत तक एक क़िला के मुहासरे में वह शरीक रहे, आख़िर उसे फ़त्ह कर लिया। फिर हम सुब्ह को उन दोनों का हिस्सा माले ग़नीमत से वसूल कर रहे थे। (सहीह अल-बुख़ारी: 4160)
(2) दूसरा वाक़िया मुख़्तलिफ़ कुतुबे तारीख़ व सिअर में दर्ज है जैसे तारीख़े तबरी, तारीख़े दिमश्क़ और फ़ज़ाइलुस्-सहाबा वग़ैरा और इसकी सनद हसन दर्जे की है। यह वाक़िया भी हज़रत उमर के ग़ुलाम अस्लम बयान करते हैं कि वह सय्यदना उमर के साथ हर्रा वाक़िम की तरफ़ निकले, ज़िरार के मक़ाम पर आग जल रही थी, हज़रत उमर ने कहा हो सकता हो यहां सवार डेरा डाला हो और सर्दी की वजह से आग जला रखी हो। क़रीब हुए तो देखा कि एक औरत के पास छोटे छोटे बच्चे रो रहे हैं और आग पर हंडिया चढाई हुई है। अलैक सलैक के बाद कुछ इस तरह गुफ़्तगू हुई।
उमर रज़ियल्लाहू अन्हु ने कहा: क्या हम क़रीब आ जाएं?
वह औरत बोली: अच्छे तरीक़े से क़रीब आ जाएं या हमें छोड़ दें।
फिर जब हम क़रीब हुए तो उमर ने पूछा: तुम्हें क्या हुवा है?
उस औरत ने कहा: रात हो चुकी है और सर्दी भी है।
उन्होंने पूछा: यह बच्चे क्यूं रो रहे हैं?
उस औरत ने जवाब दिया: भूक की वजह।
उन्होंने पूछा: हांडी में क्या चीज़ (पक रही) है?
उस औरत ने जवाब दिया: इसमें वह है जिसके साथ मैं इन बच्चों को चकरा रही हूं ताकि वह सो जाएं। हमारे और उमर के दरमियान अल्लाह है।
उमर रज़ियल्लाहू अन्हु ने फ़रमाया: अल्लाह तुझ पर रहम करे, उमर को तुम्हारे बारे में क्या पता है?
उस औरत ने कहा: उमर हमारा हाकिम है और फिर हमसे ग़ाफ़िल रहता है?
सय्यदना उमर रज़ियल्लाहू अन्हु ने मेरी तरफ़ रुख़ करके फ़रमाया: चलो हमारे साथ, फिर हम भागते हुए उस जगह गए जहां आटा रखने का स्टोर था। उन्होंने आटे की एक बोरी और चरबी का एक डब्बा निकाला और कहा: यह मुझ पर लाद दो। मैंने कहा: आप के बजाए मैं इसे उठा लेता हूं।
उन्होंने कहा: तेरी माँ ना रहे, क्या तू क़ियामत के दिन मेरा वज़न उठाएगा?
लिहाज़ा मैंने यह वज़न आप पर लाद दिया और आप के साथ चला, आप भागे भागे जा रहे थे, फिर आप ने यह सामान उस औरत के सामने डाल दिया और थोड़ा सा आटा निकाल कर कहा:
मैं इसे हवा में अच्छाल कर साफ़ करता हूं, तुम इसमें मेरे साथ तआवुन करो।
वह हांडी के नीचे फूंकें (भी) मार रहे थे फिर हांडी को उतार दिया और कहा: कोई चीज़ ले आओ। वह एक बरतन ले आई तो उन्होंने इसे उस बरतन में उंडेल दिया और फिर उन से फ़रमाने लगे: तुम इन्हें खिलाओ और मैं इसे बिछाता हूं।
उन्होंने सैर होकर खा लिया और कुछ खाना बाक़ी भी रह गया।
उमर (रज़ियल्लाहू अन्हु) खड़े हो गए और मैं भी खड़ा हो गया फिर वह औरत कह रही थी:
अल्लाह तुझे जज़ाए ख़ैर दे: अमीरुल मोमिनीन (उमर रज़ियल्लाहू अन्हु) के बजाए तुझे साहिबे इक़्तिदार (ख़लीफ़ा) होना चाहिए था।
उन्होंने फ़रमाया: जब तुम अमीरुल मोमिनीन के पास जाओ तो अच्छी बात कहना और वहां मुझ से बात करना। इन शा अल्लाह
फिर आप पीछे हट गए और ज़ानों के बल बैठ गए। हमने कहा: हमारी तो दूसरी शान है।
आप मुझ से कोई कलाम नहीं कर रहे थे फिर मैंने बच्चों को उछलते कूदते और खेलते हुए देखा और बाद में वह सो गए तो उमर (रज़ियल्लाहू अन्हु) ने फ़रमाया: ऐ अस्लम! भूक ने इनकी नींद ख़त्म कर रखी थी और इन्हें रुला दिया था, लिहाज़ा मैंने यह देखना पसन्द किया जो मैंने देख लिया है। [ फ़ज़ाइलुस्-सहाबा ज.1, स.290-291, ह.382 व सनदुहु हसन। मन्क़ूल अज़ मक़ालात, जिल्द 6, स. 250-253 ब-तस्रिफ़े क़लील]
बैतुल माल के ज़रिए ज़रूरतमंद मुसलमानों की ज़रूरियात पूरी करने के बारे में इन दो वाक़िआत से बहुत सारे अस्बाक़ मिलते हैं। इन अस्बाक़ में मिनजुमला एक सबक़ यह मिलता है कि मुस्लिम मुल्क व मुआशरा में ज़रूरतमन्दों को उनकी ज़रूरत की चीज़ें फ़राहम करने के लिए बैतुल माल का इंतिज़ाम होना चाहिए ताकि इसके ज़रिए हाजतमन्दों की हाजत पूरी की जा सके। मिस्कीन से पूछने की ज़रूरत नहीं है कि आप को क्या चाहिए बल्कि ज़िम्मादार ख़ुद ही उनकी मुकम्मल मालूमात हासिल करे और हाजत व ज़रूरत के मुताबिक़ उनकी इमदाद करे, फ़ुक़रा व मसाकीन उमूमन शर्म व हया की वजह से अपनी ज़रूरत बयान नहीं कर सक्ते हैं, यह ज़िम्मेदारों का ही काम है। ऊपर आप ने पहले वाक़िया में पढ़ा कि एक बेवा औरत के पास चंद छोटी छोटी बच्चियां थीं, उनके पास खाने पीने और गुज़र बसर करने का कोई ज़रिया नहीं था तो वक़्त के हाकिम सय्यदना उमर रज़ियल्लाहू अन्हु ने उन्हें ज़रूरत की चीज़ें, कपड़े और रूपये दिए। इसी तरह दूसरे वाक़िया में आप ने पढ़ा कि ज़रूरतमंद औरत को हज़रत उमर ने पकाने की चीज़ें आटा और चरबी अता किया। क्या आज मुसलमानों में ऐसे लोग नहीं हैं जिन्हें ज़रूरत की चीज़ें चाहिए? देखा जाए तो ऐसे लोग बड़ी तादाद में मौजूद हैं मगर उनकी ज़रूरतों को पूरा करने वाला नहीं है, दो चंद हैं जो ऐसे ज़रूरतमन्दों को तलाश करते हैं और उनके लिए ज़रूरत की चीज़ें मुहय्या करते हैं।
अब आते हैं साइल के जवाब की तरफ़ और मज़कूरा बाला वाक़िआत से अंदाज़ा लगाते हैं कि क्या दीनी मराकिज़ या बैतुल माल ऐसे काम नहीं कर सक्ते हैं? तो इसका जवाब है कि बिल्कुल कर सक्ते हैं। यहां एक सवाल पैदा होता है कि इन इदारों के पास लोगों की ज़रूरियात पूरा करने के लिए ज़कात की नक़दी रक़ूम होती हैं। क्या ज़कात की नक़दी रक़ूम से ज़रूरतमन्दों के मुताबिक़ अश्या ख़ुर्द व नोश या कपड़े ख़रीद कर दिए जा सकते हैं?
इस सवाल के जवाब में मुताद्दिद उलमा के फ़तावा हैं जिन में कहा गया है कि माली ज़कात से कोई चीज़ ख़रीद कर हम नहीं दे सकते हैं, नक़दी माल ही मुस्तहिक़ को देना पड़ेगा, ख़ौफ़े तवालत की वजह से अद्म जवाज़ का फ़तवा नक़्ल नहीं कर हा हूं, जबकि बअ्ज़ उलमा यह भी कहते हैं कि मस्लिहत व ज़रूरत के तहत ज़रूरतमन्दों के दरमियान अश्या भी तक़्सीम की जा सक्ती हैं। शेख़ इब्न बाज़ रहिमहुल्लाह से सवाल किया गया कि हम लोग राशन और ज़रूरत की चीज़ें मसलन कम्बल और कपड़े वग़ैरा ज़कात के पैसों से ख़रीद कर बअ्ज़ ग़ुरबत ज़दा इस्लामी मुमालिक जैसे सूडान, अफ़्रीक़ा, अफ़ग़ानी मुजाहिदीन के लिए भेजते हैं ख़ुसूसन जब उन जगहों पर अश्या की क़ीमतें बढ़ जाती हैं या अश्या नहीं पाई जातीं। क्या यह सहीह हैं? तो शेख़ ने जवाब दिया:
ला मानेअ् मिन ज़ालिक बाद अत् ताकिद मिन सर्फ़िहा फ़िल् मुस्लिमीन (मज्मुअ् फ़तावा व मक़ालात इब्न बाज़ 14/246) यानी इसमें कोई हर्ज नहीं अगर इस बात पर यक़ीन कर लिया जाए कि यह मुसलमानों में ही तक़्सीम किया जाएगा। इस बारे में, मैं भी यही मौक़िफ़ रखता हूं कि ज़रूरत और मस्लिहत के तहत मुहताजों के दरमियान ज़कात के पैसों से ज़रूरत की चीज़ें ख़रीद कर देने में हर्ज नहीं है इस बात की ताकीद के साथ कि जहां पैसों की ज़रूरत हो वहां पैसे दिए जाएं।
पहली वजह: इस मौक़िफ़ की ताईद इसलिए करता हूं कि हमारे ज़कात की तक़्सीम में इस्लामी मुआशरा इफ़रात व तफ़रीत का शिकार है। अव्वलन: मुस्लिम समाज में इन्साफ़ के साथ ज़कात नहीं निकाली जाती। सानियन: ज़कात के जो अवाइले मुस्तहक़ीन हैं वह अक्सर ज़कात से महरूम रहते हैं क्योंकि ज़कात का अक्सर हिस्सा मसाजिद, मदारिस और मराकिज़ में जाता है जबकि यह नाम मसारिफ़े ज़कात में मज़्कूर ही नहीं। फिर ज़कात के इन पैसों का इस्तिमाल तामीर में, बिजली पानी में, खाने पीने में और ज़रूरत की तमाम चीज़ों में होता है।
इसलिए इस्लामी मुआशरे को ज़कात की तक़्सीम में ऐतदाल बरतना होगा ताकि जो अस्ल मुस्तहिक़ हैं उन तक ज़कात की रक़म पहुंचे और उनके इलावा जहां भी जवाज़ की सूरत निकलती है वहां भी तक़्सीम की जाए।
दूसरी वजह: एक दूसरी अहम बात यह है कि ज़कात की रक़म कम और ज़रूरतमंद ज़्यादा हैं फिर उन ज़रूरतमन्दों में उमूमन कम ही सरपरस्त मर्द हुवा करते हैं, मर्द होते भी हैं तो माज़ूर, लाग़िर व बीमार, मजनून वग़ैरा, अक्सर छोटे बच्चे और बच्चियां होती हैं, औरतें होती हैं, इनके लिए सहीह सामान ख़रीदना भी दुशवार और फिर कम पैसों में ज़रूरत की चीज़ नहीं ख़रीद सकते जबकि एक ज़िम्मेदार क़िस्म का आदमी बड़ी तादाद में सामान ख़रीदे तो कम क़ीमत पर मिलेगा और कसीर तादाद को फ़ाएदा होगा गोया इन्फ़िरादी ख़रीद पर माल का ज़्यादा ज़ियाअ् मालूम होता है जबकि इज्तिमाई तौर पर ख़रीदने में मुहताजों का फ़ाएदा है।
अल्लामह इब्न तैमियह रहिमहुल्लाह कहते हैं कि गाय, बकरी और फ़स्ल वग़ैरा की ज़कात बग़ैर किसी ज़रूरत और मस्लिहत के नक़दी की सूरत में देना मम्नूअ् है फिर इसकी वजह बताते हैं क्यूं मम्नूअ् है, मज़ीद आगे बताते हैं कि किसी ज़रूरत या मुस्बत मस्लिहत की बिना पर क़ीमत की सूरत में ज़कात अदा करने में कोई हर्ज नहीं है (मज्मुअ् अल फ़तावा 25/82)
इसी तरह शेख़ इब्न बाज़ रहिमहुल्लाह लिखते हैं कि अगर ज़कात के मुस्तहिक़ लोगों की मस्लिहत को सामने रखा जाए तो नक़दी रक़म की बजाए सामान, कपड़े और राशन वग़ैरा ख़रीद कर दिया जा सकता है और इसके लिए अश्याए ज़रूरत की क़ीमत को मद्दे नज़र रखा जाएगा, मिसाल के तौर पर ज़कात का मुस्तहिक़ शख़्स: पागल हो या कम अक़ल हो या ज़हनी तवाज़ुन दुरुस्त ना हो और यह डर हो कि अगर रक़म दी जाएगी तो सहीह जगह सर्फ़ नहीं कर सकेगा तो ऐसी सूरत में मस्लिहत का तक़ाज़ा यही है कि उसे राशन ख़रीद कर दिया जाए या ज़कात की क़ीमत के बराबर कपड़े लेकर दिए जाएं, यह मौक़िफ़ अहले इल्म के सहीह तरीन अक़वाल के मुताबिक़ है (फ़तावा इब्न बाज़: 14/253)
और शेख़ मुहम्मद बिन सॉलेह उसैमीन रहिमहुल्लाह पहले कहते हैं कि ज़कात अदा करने वाला शख़्स अपनी रक़म के बदले में चीज़ें नहीं दे सकता फिर कुछ आगे कहते हैं अगर आप को ख़दशा हो कि ग़रीब घराने को रक़म की शक्ल में ज़कात देने पर वह ग़ैर ज़रूरी अश्या में सर्फ़ कर देंगे तो आप घर के सरबराह यानी बाप, माँ, भाई, या चचा से बात करें और उन्हें कहें कि मेरे पास ज़कात की कुछ रक़म है तो आप हमें अपनी ज़रूरत की अश्या बतला दें, मैं ख़रीद कर आप को दे देता हूं, इस तरीक़े पर अमल करें तो यह जाइज़ होगा, और ज़कात अपनी सहीह जगह सर्फ़ होगी (मज्मुअ् फ़तावा इब्न उसैमीन: 18/सवाल नंबर: 643)
तीसरी वजह: रमज़ान के आख़िर में सदक़तुल् फ़ित्र निकालना वाजिब है और सदक़तुल् फ़ित्र ज़कात में से है नीज़ ग़ल्ला से यह ज़कात देनी है ताहम इस ज़कात के बारे में भी अक्सर उलमा की राए यह है कि फ़ुक़रा व मसाकीन की ज़रूरत व मस्लिहत की बिना पर नक़दी रक़म भी दे सकते हैं, बल्कि बअ्ज़ तो कहते हैं नक़दी फ़ित्रा ही देना चाहिए। जब हम ग़ल्ले वाली ज़कात में फ़ुक़रा की मस्लिहत देख कर रुपया दे सकते हैं तो माली ज़कात में क्यूं नहीं मस्लिहत देखी जा सक्ती है?
इन बातों के इलावा मज़ीद बातें इस मुआमले में क़ाबिले इअ़्तना हैं।
* ज़रूरत व मस्लिहत के नाम पर लोगों में ग़ैर ज़रूरी अश्या ना तक़्सीम की जाएं यानी वही अश्या तक़्सीम की जाएं, मुहताजों को जिनकी अस्लन ज़रूरत हो।
* बसा औक़ात सस्ते दामों पर डेट एक्सपायर और ख़राब सामान ख़रीद लिए जाते हैं, यह बहरहाल ग़लत है।
* कुछ मुहताज ऐसे भी हो सक्ते हैं जिन्हें सामान की नहीं पैसों की सख़्त ज़रूरत हो ऐसे लोगों की जानकारी हासिल करके पैसों से ही मदद की जाए।
* राशन के साथ कुछ पैसे भी दिए जाएं ताकि अगर मज़ीद कुछ ज़रूरत हो तो पूरी की जा सके जैसा कि आप ने ऊपर पहले वाक़िया में पढ़ा है कि हज़रत उमर ने सामान के साथ कुछ पैसे भी दिए।
इस मौज़ू का ख़ुलासा यह है कि जब एक मालदार आदमी ख़ुद से किसी मुस्तहिक़ को नक़दी रक़म की ज़कात देगा तो नक़द की सूरत में ही देगा, इसी तरह किसी बैतुल माल को नक़दी माल की ज़कात देगा तो भी नक़द में ही देगा और इस मालदार की तरफ़ से ज़कात अदा हो जाएगी। आगे बैतुल माल की ज़िम्मेदारी है कि लोगों के माल को मुस्तहिक़ों में जहां माल की ज़रूरत हो वहां माल और जहां मस्लिहत व ज़रूरते सामान का मुतक़ाज़ी हो वहां सामान तक़्सीम करे।
 

جمعہ، 4 اگست، 2017

"भारत माता की जय" बोलना कैसा है ?

"भारत माता की जय" बोलना कैसा है ?
मक़बूल अहमद सलफ़ी
"भारत माता की जय" जैसे लगता है "भारत जिंदाबाद का नारा है", लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। इस नारे में तीन शब्द हैं। पहला शब्द: भारत "भूमि" के अर्थ में, दूसरा शब्द: "माता" भगवान के अर्थ में, तीसरा शब्द: "जे" प्रभु और नारा के अर्थ में।
हिन्दू भाइयों की आस्था के अनुसार पृथ्वी भी यहाँ देवता है जिसकी पूजा की जाती है। हिंदू भाई मानते हैं कि पृथ्वी हमारा भगवान है। यह हमें खाना देती है, रहने के लिए जगह देती है बल्कि दुनिया में जितनी चीज़ें दिखती हैं सब उसी की दैन हैं। इस विश्वास के रूप में हिन्दुओं के यहाँ "धरती माता" शब्द इस्तेमाल किया जाता है। "भारत माता" इसी धरती माता का वैकल्पिक शब्द है। मानो "माता" शब्द उनके यहां भगवान शब्द है. जैसे गौ-माता, काली-माता और दुर्गा-माता आदि। वंदे मातरम और भारत माता की जय में मानवीय समानता पाई जाती है। वंदे मातरम का अर्थ है "हे माँ! हम तेरे पुजारी हैं"। इस से संबोधन पृथ्वी को होता है। यही अर्थ और अभिप्राय "भारत माता की जय" से नकलता है।
इस्लामी आस्था की रोशनी में पृथ्वी सृष्टि है और उसका निर्माता सर्वशक्तिमान अल्लाह है। हम मुसलमान सृष्टि को सृष्टा का स्थान कभी नहीं दे सकते। हम मुसलमान "भारत जिंदाबाद" का नारा लगा सकते हैं, हमारे भी दिल में देश से प्रेम है और उसका प्रदर्शन हमेशा से किए और करते रहेंगे। इसी देश-प्रेम की भावना से अभूतपूर्व बलिदान द्वारा हमने अंग्रेजों के कब्जे से वतन आजाद कराया। लेकिन हम मुसलमान अपनी ज़बान पर बहुदेववाद पह सम्मिलित शब्द कभी नहीं ला सकते हैं इसके लिए हमें जो भी सहना पड़े स्वीकृत और गवारा है।