جمعرات، 28 اپریل، 2016

नए वर्ष का आगमन और ध्यान देने योग्य कुछ मामले

नए वर्ष क आगमन और ध्यान देने योग्य कुछ मामल
मकबूल अहमद सलफी

हर कौम अपने कैलेंडर के हिसाब से नए साल के पहले दिन का बड़ा महत्व देती है और इस दिन को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। हालांकि यह पहला दिन अन्य दिनों से कुछ अलग नहीं होता। ऐसा नहीं है कि नए साल के पहले दिन में सिर्फ खुशी ही खुशी होती है। देखा जाता है गम में डुबे लोग आज भी दुखी होते हैं। नए साल पे भी लोगों को मौत आती है। एकसिडेन्ट होता है। दुख और कठिनाइयों पेश आते हैं तो आज के दिन खुशी के तरीके मनाने का कारण व प्रोत्साहन क्या है?
इसके जवाब भले ंगठरनए सीई वर्ष के आगमन पे उपमहाद्वीप में अजीब किस्म का माहौल पाया जाता हैइस माहौल को हम इस्लामी परिप्रेक्ष्य में देखते हैं।
1⃣निया साल और Happy New Year:
पहली जनवरी के आने से कई दिन पहले से मेसेजकार्ड और मौखिक रूप पे हिप्पी न्यू ईयर (Happy New Year) के शब्दों जारी व सारी जाते हैं। स्तुति सीई साल से हटकर मुसलमानों का अपना अरबी कैलेंडर पाया जाता है और यह चंद्र / अरबी कलैंडरसषाबह किराम के ज़माने से ही पाया जाता हैउनके जीवन में भी नया हिजरी वर्ष आया मगर उन्होंने एक दूसरे को बधाई नहीं दी जो बात की दलील है कि नए साल की बधाई देना खिलाफ संत है। इसलिए किसी मुसलमान के लिए उचित नहीं कि किसी को हिप्पी नीवाेयरका कार्ड भेजनेया मेसेज लिखकर हिप्पी नीवाेयर की बधाई दे या भाषा से किसी को हिप्पी नीवाेयर कहे।
2⃣निया साल और Picnic:
पहली जनवरी लोग गांव / शहर से निकल कर रेगिस्तान और जंगल में जाकर संयुक्त दावत का आयोजन करते हैं। इसमें खाने पीने के साथ शराब,आतिशबाजी और नृत्य और सरोद की महफिल की स्थापना की जाती है। तथा पश्चिमी सभ्यता की नकल करते हुए पुरुषों के साथ युवा लड़कियों भी पिकनिक में शामिल होती हैं। पिकनिक दरअसल मौज मस्ती का दूसरा नाम है। इसमें पाए जाने वाले मामलों इस्लाम विरोधी हैं। इस अवसर पर सभी मुसलमान श्रमिकोंमहिलाओं को समझाता हूं कि इस प्रकार की दावत और पिकनिक से बचें। केवल घर के जिम्मे दरांती से अनुरोध करता हूँ कि अपने बच्चों को पिकनिक में भाग लेने की अनुमति न दें।
3⃣निया साल ाोरआतश फैलाव:
नए साल के आगमन पे आतिशबाजी का बड़ा भयानक दृश्य देखने को मिलता है। घर परगली मेंचौराहों पेउत्सव और आम गज़रगाहों पे इतना आतिशबाजी की जाती है कि इससे जाबजा दुर्घटनाओं पाए जाते हैं। यह आतिशबाजी में मुसलमानों को देखकर बहुत दुख होता है कि दीन मोहम्मद के नामलेवा काफिरों की नकल में उर्जा क्यों?
आतिशबाजी में फिजूलखर्चीजाल और वित्तीय नुकसान का पहलू और काफिरों की नकली पाई जाती है जो नए साल के हिसाब से ही नहीं बल्कि हर अनुकूल यह हराम है।
4⃣नाज्ाल और अंधविश्वास:
नए साल को लेकर कई सारी अंधविश्वास पाई जाती हैं। कुछ संबंध तो रीति-रिवाज से मगर कुछ अंधविश्वास सीधे विश्वासों से टकराते हैं। और लगभग हरमलक में अजीबोग़रीब प्रकार की परंपराओं पाई जाती है। भारत तो चमत्कार के लिए वैसे भी दुनिया भर में प्रसिद्ध निकलने वाली है।
कहीं नए साल के आगमन पे घर के पुराने फर्नीचर को निकालकर नए फर्नीचर जोड़ दिया जाता है तो कहीं पुराने सामान से बदफाली ली जाती है और इसे फेंक कर नया सामान लाया जाता है। कहीं कचड़ा घर से निकालना दुर्भाग्य निकालने के बराबर माना जाता है। तो कहीं पे सिक्का उछालकर कसमतों का फैसला किया है। इस्लाम में इस प्रकार की परंपरा और अंधविश्वास और बदफाली की कोई गुंजाइश नहीं।
नाज्ाल पे हम क्या करें?
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यहां यह सवाल उठता है कि अगर हम नए साल के आगमन पे उपरोक्त मामलों अंजाम नहीं दें तो हमें नए साल के आगमन पे क्या करना चाहिए?
इस सवाल के संबंध में सबसे पहले यह बताना चाहता हूं कि हम लोग मुसलमान हैं और मुसलमानों का नया साल सीई नहीं हिजरी है। मानो हम पहली जनवरी से कोई सरोकार नहीं यदि सरोकार है तो इस्लामी साल है।
इस्लाम में नए साल के आगमन मुहर्रम से होती है। और eyelashes चार पवित्र महीनों में से एक महीना है।
हमें मुहर्रम के आगमन पे पहले यह चिंता है कि यह दुनिया नश्वर हैयहाँ की हर्षिता नश्वर हैहमें भी एक न एक दिन यहाँ से जाना है। इस कल्पना से हमारे अंदर यह भावना जागज़ें होगा कि हम जीवन का एक कीमती साल खो दिया। साथ ही यह मषासबह भी करना है कि पिछले महीनों में हम क्या खता हुईक्या पाप हुए और कौन सा अच्छा काम हमने सोचा और नहीं कर सका। यह प्रशासन के साथ अगले साल के लिए धर्म के रास्ते चलने के लिए पूरी योजना। अगर हम धर्म के रास्ते चलने के लिए कोई ठोस कार्य योजना तैयार न किया तो एक साल यूं ही हमारी उम्र से कम होता चला जाएगा और पैर में बुराई के सिवा कुछ न होगा। और जब उम्र सभी करके निर्माता हककीक मिलेंगे तो कफ खेद मिलना होगा।
इससे पहले कि अफसोस करनी अपना दामन नेकियों से भर लेते हैं।
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मुहम्मदी क़ायदा : एक नज़र तक़रीज़:

मुहम्मदी क़ायदा : एक नज़र तक़रीज़:
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मक़बूल अहमद सलफ़ी / दाई दफ़्तरतआवुनी बराए दावत व इरशाद ताइफ़सऊदी अरब

क़ुरआने करीमआख़िरी आस्मानी किताब हैयह गंजीनह उलूम व फ़ुनून है। यही वजह है कि जहां इसे मुसलमान पढ़ते हैं वहीं ग़ैरों ने भी इसे पढ़ कर ख़ूब ख़ूब फ़ाएदा उठा या।क़ुरआन के मुताद्दिद एजाज़ हैंइनमें से एक यह भी है कि जैसे अल्लाह तआला ने इस किताब को आसान बनाया है वैसे ही इसका पढ़ना और हिफ़्ज़ करना भी आसान बिना दिया है। ज़माना क़दीम से यह रिवायत चली आ रही है कि तिफ़्ल मक्तब महज़ एक क़ायदा की तालीम हासिल करता है और बराहे रास्त क़ुरआने करीम अपने हाथों में ले लेता हैगोया क़ुरआन पढ़ना क़ुरआनी क़ाएदे पर मुनहसिर है। क़ायदा जिस क़द्र आसान और मुमताज़ होगा इतनी ही जल्दी बच्चे के हाथ में क़ुरआन होगा।इस वक़्त क़ाईदों की बहुतात है मगर" मुहम्मदी क़ायदा " में जो ख़ूबियां हैं वह सब से अलग और सब से निराली हैं।

इसकी चंद अनोखी ख़ूबियां मनदर्जा ज़ेल हैं।

यह क़ायदा मुसन्निफ़ के कई साला तदरीसी तजरुबात का निचोड़ है।

इस क़ाएदे के तीस अस्बाक़ इस क़द्र सहल हैं कि बच्चों को याद करने में कोई दुशवारी नहीं होगी।

मुताद्दिद किताबों से इस्तिफ़ादाकरके मुसन्निफ़ ने क़िरअत व तजवीद के क़वाइद इख़्तिसार के साथसलीस अंदाज़ में पेश किया है।

इस किताब के पढ़ाने का भी एक थेओरी है जिसे समझ लेने के बाद निहायत क़लील मुद्दत में बच्चा यह क़ायदा ख़त्म कर सकता है।

यह क़ायदा ख़त्म होते ही बच्चा अरबी व उर्दू ज़बान के साथ क़िरअत व तजवीद का भी जानकार होगा बशर्तेकि मुदर्रिस ने मुसन्निफ़ के बताए हुए उसूल  नज़रियात को बरता हो।

मश्क़ व इम्तिहानी सवालात का इहतिमाम भी इस क़ाएदे को दीगर क़वाइद से मुमताज़ करता है।

इतनी जल्दी इस क़ाएदे के बीस से ज़ाइद एडीशन शाए हो जाना अव्वाम में तल्क़ी बिलक़बूल की वाज़ेह दलील है।

तरक़्क़ियाती दौर में इस मुनफ़रिद क़ाएदे की सी डी भी तयार कर ली गई हैबच्चों को किताबी क़ाएदे के साथ अगर सी डी से भी मश्क़ कराई जाए तो सोने पे सुहागा हो जाएगा।

मुहम्मदी क़ाएदे का "अल-मिस्बाह"सॉफ़्टवेयर भी बेहद मुफ़ीद है।

इस क़ाएदे की तसनीफ़ व तालीफ़ में मदरसा मुहम्मदिया के नाज़िम क़ारी अबू मुआज़ अश्फ़ाक़ अहमद मुहम्मदी ने बड़ी इर्क़ रेज़ी से काम लिया है जिसके लिए मैं दिल की गहराइयों से इन्हें मुबारक बाद देता हूं। यह काम जमात के लिए एक सरमाया की हैसियत रखता है। अहले मदारिसमुदर्रिसीन और क़ुर्रा हज़रात से अपील करता हूं कि अपने अपने मदरसों और मक्तबों में इस क़ायदा को निसाब में दाख़िल करें जो इस वक़्त मेरी नज़र में सब से उम्दा क़ायदा है। आख़िर में अल्लाह तआला से दुआ करता हूं कि इस किताब को उम्मत के लिए नफ़ा बख़्श बनाएमुसन्निफ़ क़ायदा मुहम्मदी बिरादरम अबू मुआज़ मुहम्मदी के लिए सदक़ा जारिया बनाए और इस क़ाएदे की तरतीब  तज़ईनकिताबतव तबाअ़त और नश्र व इशाअत में मुआविन सबको अज्रे जज़ील से नवाज़े। और मुसन्निफ़ को मज़ीद इस तरह से जमइय्यत व जमात के काज़ में इज़ाफ़े की तौफ़ीक़ बख़्शे। आमीन

  सल्लल्लाहु अला नबिय्यिना मुहम्मद  आलिहि व सल्लम


इब्लीस जिन था या फ़रिश्ता ?

इब्लीस जिन था या फ़रिश्ता ?

डॉक्टर ज़ाकिर नाइक से पूछा गया:
"क़ुरआने मजीद में मुताद्दिद मक़ामात पर कहा गया है कि इब्लीस एक फ़रिश्ता था लेकिन सूरहए कहफ़ में फ़रमाया गया है कि इब्लीस एक जिन था। किया यह बात क़ुरआन में तज़ाद को ज़ाहिर नहीं करती ?
तो डॉक्टर साहिब ने जवाब दिया:
क़ुरआने करीम में मुख़्तलिफ़ मक़ामात पर आदम व इब्लीस का क़िस्सा बयान किया गया है। सूरहए बक़रा में अल्लाह तआला फ़रमाता है:﴿
 ﴿وَإِذ قُلنا لِلمَلـٰئِكَةِ اسجُدوا لِـٔادَمَ فَسَجَدوا إِلّا إِبليسَ﴾
हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सज्दह करो, सो इन सब ने सज्दह किया सिवाए इब्लीस के। (अल-बक़रह:34 )
इस बात का तज़किराहस्बे ज़ेलआयात में भी किया गया है:
٭ सूरहए आराफ़ की आयत:11
٭ सूरहए हिज्र की आयात:31-27
٭ सूरहए बनी इस्राईल की आयत:6 1
٭ सूरहए तॉ-हा की आयत:11 6
٭ सूरहए सॉद की आयत:74-7 1
लेकिन ( 18 ) वें सूरतुल् कहफ़ की आयत:50 कहती है:
﴿وَإِذ قُلنا لِلمَلـٰئِكَةِ اسجُدوا لِٔادَمَ فَسَجَدوا إِلّا إِبليسَ كانَ مِنَ الجِنِّ فَفَسَقَ عَن أَمرِ‌ رَ‌بِّهِ... )٥٠(
"और जब हमने फ़रिश्तों से कहा:आदम को सज्दह करो तो इन सब ने सज्दह किया सिवाए इब्लीस के, वह जिन्नों में से था। इसने अपने रब के हुक्म की नाफ़रमानी की।" (सूरतुल् कहफ़)

तग़लीब का कुल्लिया
सूरतुल् बक़रा की मज़कूरा बाला आयत के पहले हिस्से से हमें यह तास्सुर मिलता है कि इब्लीस एक फ़रिश्ता था। क़ुरआने करीम अरबी ज़बान में नाज़िल हुवा है। अरबी ग्रामर में एक कुल्लिया तग़लीब के नाम से मारूफ़ है जिसके मुताबिक़ अगर अक्सरयत से ख़त्ताब किया जा रहा हो तो अक़ल्लीयत भी ख़ुद बख़ूद इसमें शामिल होती है। मिसाल के तौर पर में 100 तालिब इल्मों पर मुश्तमिल एक ऐसी क्लास से ख़त्ताब कर रहा हूं जिसमें लड़कों की तादाद 99 है और लड़की सिर्फ़ एक है, और मैं अरबी ज़बान में यह कहता हूं कि सब लड़के खड़े हो जाएं तो इसका इतलाक़ लड़की पर भी होगा। मुझे अलग तौर पर इससे मुख़ातिब होने की ज़रूरत नहीं होगी।
इसी तरह क़ुरआन के मुताबिक़ जब अल्लाह तआला ने फ़रिश्तों से ख़त्ताब किया तो इब्लीस भी वहां मौजूद था, ताहम इस अम्र की ज़रूरत नहीं थी कि इसका ज़िक्र अलग से किया जाता, लिहाज़ा सूरहए बक़रा और दीगर सूरतों की इबारत के मुताबिक़ इब्लीस फ़रिश्ता हो या ना हो लेकिन 18 वें सूरतुल् कहफ़ की पचासवीं आयत के मुताबिक़ इब्लीस एक जिन था। क़ुरआने करीम में कहीं यह नहीं कहा गया कि इब्लीस एक फ़रिश्ता था। सो क़ुरआने करीम मैं इस हवाले से कोई तज़ाद नहीं। (इस्लाम पर 40 ऐतराज़ात के अक़ली व नक़ली जवाब)
इब्लीस एक जिन था फ़रिश्ता नहीं, इसे किताब व सुन्नत के हवाले से इस तरह समझ सकते हैं।
(1) क़ुरआन की आयतों से साफ़ ज़ाहिर है कि इब्लीस जिन था,फ़रिश्ता होने की क़ुरआन से या सहीह हदीस से कोई दलील नहीं।
(2) इब्लीस आग से पैदा किया गया।दलील:
قَالَ أَنَا خَيْرٌ مِنْهُ خَلَقْتَنِي مِنْ نَارٍ وَخَلَقْتَهُ مِنْ طِينٍ
 (अल-आराफ़:12 )
जबकि फ़रिश्ता नूर से। दलील:
خُلِقَت الملائكة من نور ،  وّخُلِقَ الجَّان من مارجٍ من نار ، وخُلِقَ آدم مما وُصِفَ لكم
(मुस्लिम:2 9 9 6 )
(3) फ़रिश्तों की औलाद यानी नस्ल नहीं होती जबकि इब्लीस की औलाद होती है। (सूरतुल् कहफ़:50)
(4) फ़रिश्ते कभी अल्लाह की नाफ़रमानी नहीं करते जबकि इब्लीस (शैतान) ने अल्लाह की नाफ़रमानी की और इसकी औलाद क़ियामत तक अल्लाह की नाफ़र्मानियां करती रहेंगी।
(5) यह सहीह है कि बअ्ज़ अहले इल्म ने भी कहा है कि इब्लीस फ़रिश्तों में से था मगर इन अहले इल्म के पास कोई सरीह दलील नहीं।दलील के तौर पे असर और क़ौल पेश करते हैं यह भी इस्राईलियात से माख़ूज़ है।
(6) जिन्नों को इरादा व इख़्तियार दिया गया है,इसलिए तो इताअत से इनकार भी करते हैं, जबकि फ़रिश्तों के पास इख़्तियार नहीं वह हमेशा अल्लाह की इताअत करते हैं।

यह सारी बातें वाज़ेह करती हैं कि इब्लीस जिन्नों में से था ।

आप के सवालों के जवाब

आप के सवालों के जवाब
(1) सवाल:फ़ातिहा किया हुवा खाना कैसा है ?
जवाब:आज कल फ़ातिहा ख़्वानी की रस्म बिल्कुल तक़रीब की शक्ल इख़्तियार कर लिया है,इसका सबूत नबी और अस्हाब नबी से नहीं मिलता जिसकी वजह यह बिदअत क़रार पाएगी।इस लिहाज़ से इसका खाना भी जाएज़ नहीं होगा।
(2) सवाल:हिन्दू के घर का खाना खा सकते हैं जबकि वहां हराम माल का पक्का होता है ?
जवाब:वह हिन्दू जो हराम कारोबार करता हो इस हराम कमाई से दावत खिलाए तो नहीं खाना चाहिए मगर सभी हिन्दू हराम कारोबार नहीं करते।तो अगर ऐसा हिन्दू दावत करे जिसकी कमाई हराम ज़राए का ना हो तो इसकी दावत में शिरकत कर सक्ते हैं।याद रहे यह दावत हिन्दुओं की मज़्हबी ना हो और ना ही खाने में हराम अश्या का इहतिमाम किया हो।

(3) सवाल:जब हम सफ़र पे हों और जुमा की नमाज़ अदा करनी हो तो तहिय्यह अलमसजद वाजिब होगी क्योंकि जुमा के दिन इसकी सख़्त ताकीद वारिद है ?
जवाब:मुसाफ़िर पे जुमा की नमाज़ फ़र्ज़ नहीं है लेकिन अगर जुमा पढ़ना चाहे तो पढ़ सकता है।तहय्या अलमसजद का हुक्म सुन्नत है और इसका ताल्लुक़ जुमा से नहीं है बल्कि मस्जिद से है जब भी मस्जिद आए तो तहिय्यह अलमसजद पढ़ना चाहिए चाहे जुमा का दिन हो या कोई और दिन व वक़्त ।
(4) सवाल:क्या खड़ा होकर पानी पीना हराम है जैसा कि एक हदीस में सख़्त मुमानिअत पाता हों ?
जवाब:ज़रूरतन खड़े होकर पानी पीना जाएज़ है और रसूलुल्लाह से खड़े होकर पीना साबित है मगर आदतन खड़े होकर पानी पीना नहीं चाहिए ।
(5) सवाल:अरबी के कौन कौन से महीने में उमरा करना अफ़्ज़ल है ?
जवाब:एक हज का उमरा है जो हज के महीनों में अदा किया जाता है इसका ताल्लुक़ हज से होता है।इसके अलावा रमज़ान में उमरा करना हज के बराबर सवाब मिलता है।बक़िया महीनों में उमरा करना बराबर है। बअ्ज़ लोग रजब के महीने में उमरा करना अफ़्ज़ल मश्हूर किए हुए हैं मगर इसकी कोई हैसियत नहीं।
(6) सवाल:मस्जिद में सुन्नत या नफ़्ल नमाज़ पढ़ते हुए फ़र्ज़ नमाज़ की इक़ामत हो जाए तो इस हालत में किया करें ?
जवाब:नबी का फ़रमान है कि जब फ़र्ज़ नमाज़ की इक़ामत हो जाए तो कोई नमाज़ नहीं।इसलिए हमें इस हालत में अपनी नमाज़ तोड़ के फ़र्ज़ नमाज़ में शामिल हो जाना चाहिए ।
(7) अहले तशीअ् किन दलाइल की बुनियाद पे क़ियाम में इरसाल (हाथ ना बांधना) करते हैं ?
जवाब:अहल ش इ अ़ नमाज़ में इरसाल करने से मुताल्लिक़ ज़ईफ़ व मौज़ू रिवायात पेश करते हैं।हमें शीआ के अमल से कोई लेना देना नहीं।हमारे लिए मुहम्मद अरबी का अमल ही नमूना है जो सहीह अहादीस़ से साबित हो।आप नमाज़ में क़ियाम की हालत में सीने पे हाथ बांधा करते थे ।
(8) सवाल:क्या हर रक्अत के शुरू में तअव्वुज़ व तस्मियह का पढ़ना ज़रूरी है या सिर्फ़ तस्मियह काफ़ी है ?
जवाब:तअव्वुज़ व तस्मियह सूरह फ़ातिहा के शुरू में पहली रक्अत में पढ़ना सुन्नत है और दीगर रकातों में नहीं पढ़ना है।लेकिन अगर कोई हर रक्अत में तअव्वुज़ व तस्मियह पढ़ता है तो इसमें कोई हर्ज नहीं।हाँ अगर किसी रक्अत में कोई मुस्तक़िल सूरत पढ़े तो वहां तस्मियह पढ़ना मशरूअ् है ।
वल्लाहु अअ्लम बिस्सवाब

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